कृष्णा सोबती के निबंधों में लेखिका का वैचारिक साहस

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पुजा जितेंद्रप्रताप सिंह, सुनीता बनसोड

Abstract

हिन्दी साहित्य में कृष्णा सोबती को प्रायः एक सशक्त कथाकार के रूप में स्मरण किया जाता है, किन्तु उनके निबंध, वक्तव्य और सामाजिक टिप्पणियाँ भी समान रूप से महत्त्वपूर्ण हैं। प्रस्तुत शोध-पत्र का उद्देश्य सोबती के निबंधात्मक लेखन में निहित वैचारिक साहस का विश्लेषण करना है। यहाँ ‘वैचारिक साहस’ से आशय उस बौद्धिक निर्भीकता से है जिसके माध्यम से लेखिका सत्ता-संरचनाओं, पितृसत्तात्मक मान्यताओं, सांस्कृतिक रूढ़ियों और साहित्यिक संस्थानों से संवाद करती हैं, उन्हें प्रश्नांकित करती हैं तथा आवश्यक होने पर उनका प्रतिरोध भी करती हैं।


सोबती के निबंधों में स्त्री की अस्मिता, भाषा की स्वायत्तता, लेखक की स्वतंत्रता और सामाजिक न्याय के प्रश्न केंद्रीय रूप से उपस्थित हैं। वे किसी वैचारिक खांचे में सीमित न होकर अनुभव-आधारित दृष्टि प्रस्तुत करती हैं। उनके लेखन में न तो अनावश्यक आक्रोश है और न ही समझौते की प्रवृत्ति; बल्कि एक संतुलित, तर्कसंगत और स्पष्ट अभिव्यक्ति है, जो पाठक को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करती है।


यह शोध पाठ-विश्लेषण पद्धति पर आधारित है, जिसके माध्यम से चयनित निबंधों और वक्तव्यों में प्रयुक्त भाषा, तर्क-शैली और वैचारिक संरचना का अध्ययन किया गया है। निष्कर्षतः यह स्पष्ट होता है कि सोबती का निबंधात्मक लेखन हिन्दी साहित्य में वैचारिक स्वतंत्रता और स्त्रीवादी चेतना का सशक्त दस्तावेज है।

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