साम्प्रदायिक विसंगतियों को व्यक्त करता उपन्यास ‘अगिन पाथर’

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साहेब हुसेन जहागीरदार

Abstract

भारत आज कई समस्याओं से जूझ रहा है। उनमे सबसे बड़ी चुनौती के रूप में उभरी है –सांप्रदायिकता। सांप्रदायिकता की इस आग ने कई निष्पाप लोगों को भस्म कर दिया है। भारत में सांप्रदायिकता की जड़ें बहुत मजबूत हुई हैं। सांप्रदायिकता के अनेक रूपों में धार्मिक सांप्रदायिकता सबसे प्रमुख है। हिंदी के उपन्यासकारों ने अपने उपन्यासों में देश के सामने भयानक, अमानवीय, लोकतंत्र-विरोधी सांप्रदायिकता का गंभीर चित्रण किया किया। सन 2007 में प्रकाशित व्यास मिश्र का पहला उपन्यास ‘अगिन पाथर’ सांप्रदायिकता के भयावह चेहरे को बेनकाब करता है। भारतीय प्रशासनिक सेवा (आइ.ए.एस) में कार्यरत अनेक पदों पर कार्य करते हुए उपन्यासकार ने भारतीय समाज के ताने-बाने को बहुत ही सूक्ष्म ढंग से देखा है, भोगा है। कदाचित उसी फलस्वरूप इस उपन्यास की सृष्टि हुई है। बाबरी मस्जिद ध्वंस की घटना को केंद्र में रखकर लिखा गया है। यह उपन्यास एक ओर कट्टरवादी सोच को उजागर करता है, तो दूसरी ओर सांप्रदायिक सदभाव स्थापित करनेवाली सोच की छटपटाह बयान करता है।

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