भारतीय ज्ञान परम्परा में स्त्री अधिकार और आधुनिकता: एक व्यवस्थित समीक्षा

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पूजा सिंह, वीरेंद्र कुमार चंदोरिया

Abstract

भारतीय ज्ञान परंपरा को अपनाने के क्रम में एक ठोस सवाल का सामना करना पड़ता है और सवाल यह है कि क्या भारतीय ज्ञान परंपरा स्त्री विभेद और समानता के संदर्भ में दोष पूर्ण है अथवा नहीं है? इसके उत्तर के समर्थन में सदैव एक- दो उद्धरण देकर सवाल का उत्तर दे दिया जाता है। हमने शोध के माध्यम से ऐसे ही कुछ प्रश्नों का उत्तर देने का प्रयास किया है। हमारें निष्कर्ष दर्शाते हैं कि भारतीय ज्ञान परम्परा में महिलाओं के अधिकारों को लेकर अनेक दृष्टिकोण और प्रावधान मिलते हैं। जिनकी चर्चा प्राचीन ग्रंथों जैसे धर्मशास्त्र, अर्थशास्त्र और कामसूत्र में की गई है। ये ग्रंथ महिलाओं के जीवन के विभिन्न पहलुओं जैसे विवाह, तलाक, पुनर्विवाह और संपत्ति अधिकारों को गहराई से समझने का प्रयास करते हैं। इसमें देखा गया है कि प्राचीन काल में भी महिलाओं को कुछ परिस्थितियों में तलाक और पुनर्विवाह का अधिकार प्राप्त था। कौटिल्य और नारद जैसे शास्त्रकारों ने नपुंसकता, पति की दीर्घकालिक अनुपस्थिति और आपसी असहमति के आधार पर तलाक की अनुमति दी थी। वहीं विधवाओं के पुनर्विवाह और उनके संपत्ति अधिकारों को लेकर भी विभिन्न मत पाए जाते हैं। याज्ञवल्क्य, बृहस्पति और विष्णुस्मृति जैसे लेखकों ने विधवाओं को संपत्ति पर अधिकार देने का समर्थन किया जबकि अन्य ग्रंथों मे संपत्ति पर अधिकार पुरुषों को देने की बात की गई हैं। आधुनिक काल में समाज सुधारकों ने इन प्राचीन ग्रंथों का पुनःपरीक्षण करते हुए महिलाओं के अधिकारों की पुनःव्याख्या की उदाहरण स्वरूप राजा राममोहन राय, स्वामी विवेकानंद और लाला लाजपत राय आदि समाज सुधारकों ने महिलाओं के अधिकारों को लेकर अनेक सुधारात्मक उपाय किए। सती प्रथा का उन्मूलन, विधवा पुनर्विवाह की स्वीकृति और संपत्ति अधिकारों में समानता जैसे प्रयास महिलाओं के जीवन को सम्मान और स्वतंत्रता प्रदान करने की दिशा में महत्वपूर्ण सिद्ध हुए। उन्होंने प्राचीन ग्रंथों में छुपी हुई संवेदनशीलता को आधुनिक संदर्भ में प्रस्तुत कर समाज में महिलाओं की स्थिति को सुदृढ़ करने का प्रयास किया। भारतीय समाज में आज भी पितृसत्तात्मक मानसिकता और पारंपरिक धारणाएँ महिलाओं की प्रगति में बाधक बनती हैं। लेकिन प्राचीन ग्रंथों और आधुनिक कानूनी सुधारों के बीच एक संवाद स्थापित कर समाज को संतुलित किया जा सकता है। इस शोध का निष्कर्ष यह है कि प्राचीन भारतीय ज्ञान परम्परा और आधुनिक दृष्टिकोण के बीच एक संतुलन स्थापित कर महिलाओं के अधिकारों की रक्षा और उन्हें सशक्त बनाने की दिशा में प्रभावी कदम उठाए जा सकते हैं। इन विचारों और प्रथाओं को समकालीन संदर्भ में अपनाकर महिलाओं को समाज में उनका उचित स्थान दिलाने की आवश्यकता है।

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